हमारे नारों में कितनी सच्चाई Khwaja is the poor Nawaz: he who argues Namaz will incur great shame. - hadees war Hindi 2019 Muslim Aaj Hadees in English hadhis

हमारे नारों में कितनी सच्चाई Khwaja is the poor Nawaz: he who argues Namaz will incur great shame.

हमारे नारों में कितनी सच्चाई

 Muharram 2019

Khwaja is the poor Nawaz: he who argues Namaz will incur great shame.


Hazrat Sultan Bahu Fermate: Benamazi is worse than Suvvar.


हमारे नारों में कितनी सच्चाई
                    اَلصَّــلٰوةُوَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَارَسُوْلَ اللّٰهﷺ

अगर हमारे नारे सच्चे होते तो मस्जिदे खाली न दिखाई देती, शादियो में नाच, गाना देखने को न मिलता, हमारी मां बहने बिना पर्दे के बाजारों में न गुमती, हमारे घरों में गाने बजे ओर गन्दी फिल्मे न दिखाई देती, हमारी औरते गेर मरहम मर्दो के सामने यूँ अपना दिखावा न करती।


  बल्कि हमारे नारे सच्चे होते तो आज मस्जिदे आबाद होती, हमारे घरों में गानों की जगह तिलावते क़ुरआन सुनाई देता, शादिया सुन्नत के मुताबिक़ होती, हमारी औरते बा पर्दा रहती।

लेकिन कहा हम और कहा गौषे पाक رضي الله عنه ! कहा हम और कहा गरीब नवाज رضي الله عنه ! हमारे जैसो से उनका क्या रिश्ता ? अमल को छोड़ के शब्दों को फ़ज़ीलत देने वालो के लिए तो ये कहावत ही सही है...ये मुंह और मसुर की दाल

दुन्या में जो लोग किसी पार्टी का झंडा लिये चलते है तो उनको पार्टी के सपोर्टर कहा जाता है। अगर वो दंगे करे, लोगो को सताये, गालिया दे तो अवाम इस बिना पर पार्टी को जिम्मेदार ठहराती है। बेशक पार्टी के सिद्धांत बुरे न हो पर पार्टी के सपोर्टर के अख़लाक़ बुरे हो तो लोग पार्टी को ही बुरा कहते है।

 इसी तरह दारू पीन वाले झंडा लेके चले कि गौष का दामन न छोड़ेंगे!  बदकार लोग झंडा लेके चले कि ख्वाजा का दामन न छोड़ेंगे! चोर झंडा लेके चले कि हुसैन का दामन न छोड़ेंगे! लंफ़ंगे झंडा लेके चले कि मुश्किलकुशा का दामन न छोड़ेंगे! तो अब जो लोग ये नही जानते कि मुश्किलकुशा कौन है? गौषे आज़मे कौन है? तो देखने वाले तो यही समजेंगे की जो जिस पार्टी का झंडा लेके फिरता है उस पार्टी की राह भी उनके सपोर्टर की तरह ही होगी!

  और जो इन बुज़ुर्गाने दिन को जानते है लेकिन उनसे अकीदत नहीं रखते तो वो लोग ऐसे बद अमलो के हाथ मे झंडा देख के उनका मजाक उड़ाएंगे! इसी लिए नारा लगाने वालों को अपने बद अमलो से बुजुर्गो के नाम को खराब नहीं करना चाहिये। सिर्फ नारे बाज़ी करके अपनी झहलत का एलान नहीं करना चाहिये। बल्कि सर से ले कर पाऊं तक उन बुजुर्गो के रंग में रंगजान चाहिये।

क्या आप जानते नही ! दुन्या में जब एक बाप का बेटा नाफ़रमान होता है तो बाप के लिए वो कुछ काम का नही रहता। बाप उससे नाराज हो के कहता है अगर तुझे ऐसे ही काम करने है तो मुझे अपना बाप न कहना, में तुझे अपना बेटा समझने तैयार नहीं, तूने मुआशरे में मेरा नाक कटा दिया, अब हमें घर से बाहर निकलते वक्त 100 बार सोचना पड़ता है, की अभी कोई कुछ कह न दे।

    जबकि बाप के अख़लाक़ अच्छे है, सिर्फ बेटा निकम्मा नकारा है। फिर भी बेटे की निस्बत और सम्बंध बाप के साथ है उस को लेके बाप को ये सब सुनना पड़ता है, आखिरकार वो बेटे से रिश्ता तोड़ देता है।

    जब एक बाप अपने बेटे के बुरे अख़लाक़ की वजह से अपने बेटे को बेटा कहने को तैयार नही है, तो क्या गौषे पाक رضي الله عنه बेनामाज़ी की निस्बत अपनी तरफ लगाना पंसद फरमाएंगे ? क्या गरीब नवाज رضي الله عنه शराबी जुगारी को अपनी निस्बत में रखना पसंद करेंगे ? बुजुर्गो और वली शैतान की निस्बत अपनी और कैसे मनसूब कर सकते है ?

    हम अपनी ज़बान से चाहे कितने भी नारे लागले इससे कुछ फायदा हासिल न होगा। जम कामयाब तब कहलाएंगे जब ये बुजुर्ग हमे अपना गुलाम बना ले, और ये अज़ीम सौगात हमे तब ही हासिल होंगी जब हम उनके बताए रिश्ते पे चल पड़ेंगे।

गौष का दामन नही छोड़ेंगे" का पुरजोश नारे लगाने वालों, गौषे आज़म की किताब 'गुण्यतुत्तालिबिन' आप फरमाते है: बेनामाज़ी को मुसलमानों के क़ब्रस्तान में दफन न किया जाये और उसकी नमाज़े जनाज़ा भी न पढ़ी जाये! क्योंकि वो नमाज़ न पढ़ने से इस्लाम के दायरे से खारिज हो गया है।

    ख्वाजा गरीब नवाज फरमाते है: नमाज़ को तर्क करने वाला बहुत शर्मिंदगी को जेलेंगा।

     हज़रत सुल्तान बाहु फरमाते है: बेनामाज़ी सुव्वर से भी बदतर है।

     जब बेनामाज़ी के लिये इन बुजुर्गो का ये कहना है, तो नमाज़ के साथ दूसरे भी बुरे काम करने वालो के लिए क्या हुक्म होगा!

     फिर बेनामाज़ी को कहा हक़ पहोचता है कि गौष का दामन नहीं छोड़ेंगे! जुगरियो को कहा ये हक़ पहोचता है कि वो कहे ख्वाजा का दामन नहीं छोड़ेंगे! बदकरो को कहा हक़ पहोचता है कि कहे शहीदे आज़म का दामन नहीं छोड़ेंगे!

    आह! तुम दामन छोड़ने की बात कहां कर रहे हो! तुमने तो दामनो को पांव के नीचे कुचल दिया है! नमाज़ अदा न करने वालो ने बुजुर्गो का नमाज़ पढ़ने का अमल छोड़ दिया।

   दामन पकड़ने का मतल उनके तऱीके के मुताबिक़ अमल करना है, वो नमाज़ी थे, हमे भी नमाज़ी बनना है, वो सुन्नतों पर अमल करने वाले थे, हमे भी सुन्नतों पर अमल करने वाला बनना है। वो हराम और नाजायज़ कामो से दूर थे तो हमे भी इन कामो से दूर रहना चाहिए इसी का नाम है बुज़िर्गो का दामन पकड़ना।

जब इन बुजुर्गो के बताए राह पे न चलकर दामन छोड़ दिया है, तो ये समज में नही आता कि उनके दामन को न छोड़ेंगे की रट क्यों लगा रहे है!

     नमाज़ न पढ़ने वाले सुन्नतों पर न चलनेवाले शैतान की पैरवी कर रहे है, गाने बाजे, फिल्मे ड्रामे देखने वाले शैतान की पैरवी कर रहे है, अल गरज़ इस्लाम की शरीअत के खिलाफ जितने भी काम है वो सब शैतान के काम है वो शैतान की पैरवी कर रहे है शैतान का दामन थाम रहे है।

     तो जब पैरवी करके शैतान का दामन पकड़े और ज़बान से बुजुर्गो के दामन पकड़ने का एलान करे! क्या इसमें जहालत का अंधेरा नहीं दिखता ?

    जिनसे जितनी मुहब्बत हम रखते है उनके कमो से भी हमे उतनी ही महब्बत होती है। मुहब्बत मुहीब को अंधा व बेहरा बना देता है। वो महबूब के अमल में फायदा व नुक़्शान नही देखता, सिर्फ इतना ही देखता है कि ये काम मेरे महबूब को पसंद है? तो अब मुहब्बत का तकाज़ा ये है कि महबूब को जो पसन्द है उसे हम भी पसन्द करे।

 मजनू को लैला से मुहब्बत थी, तो वो लैला की गली के कुत्ते से भी मुहब्बत करता था! उसकी निगाह कुत्ते की और न थी बल्कि लैला की गली की और थी। तो जब एक दुन्या का आशिक़ अपनी माशुकके गली के कुत्ते को पसंद करता है, तो ए मुसलमानो हम तो अल्लाह के महबूब मुहम्मद मुस्तफा से मुहब्बत का दावा करते है तो फिर उनकी सुन्नतों पर अमल करने में शर्म क्यों? हमारे महबूब को चेहरे पे दाढ़ी सजाना पसन्द है तो अब हम ये नहीं देखेंगे कि ये हम पे अच्छी लगेगी या नहीं। क्या तुम मुहब्बत के दावे करके भी उनके अमल में अपना फायदा देख रहे हो? आह! क्या तुम्हें पता नहीं कि मुहब्बत की राह में फायदा देखने वाला मतलब परस्त कहलाता है ?


     अब तू खुद फैसला कर की तेरी मुहब्बत सच्ची नहीं ? ये मतलब परस्ती की है। जो काम तुजे पसन्द आता हैं उसे अपनाता है और जो काम तेरी चाहत के मुताबिक़ नही उसे तू छोड़ देता है! तो इससे ज़ाहिर होता है कि तू नफ़्स का आशिक़ है नबी का नहीं। जब तू आमाल शैतान के करता है तो नबी का दामन न छोड़ेंगे ऐसे नारे क्यों लगता है

ऐ मुहब्बत का दावा करने वालो! तू मुहब्बत के राज़ से वाकेफ नहीं, क्योंकि तेरा नफ़्स अब तक जिंदा है और वो अपनी ख्वाहिशात ज़ाहिर कर रहा है और तू उसका गुलाम बन के गुम रहा है। मुहब्बत के क़दम उठाने से पहले तू तेरे नफ़्स को मार डाला! कान और आंख को महबूब के अलावा दुसरो के लिए अंधा और बेहरा बना दे तब ही तुझे तेरे महबूब के तरीके पसन्द आएंगे और तेरे कान को महबूब की बाते अच्छी लगेगी।

     क्या तुजे पता नहीं? मुहब्बत दावा हम भी करते है और साहबा भी करते थे। फिर भी दोनों के अमलो में कितना फर्क है। हम अमल में फायदा देखते है और वो अमल में महबूब को देखते थे। क्योंकि वो मुहब्बत के राज़ से वाकिफ थे और हम नावाकिफ है। वो नफ़्स को मार के मुहब्बत करते थे  जबकि हम नफ़्स की ताजा रख के दावा करते है। इसी वजह से दोनों के अमलो में फर्क दिखता है।

    हज़रत राबिया बसरिययह رضي الله عنها फरमाती है: अगर तेरी मुह  त सच्ची होती तो तू महबूब के हुक्म की पैरवी करता।


    बेशक आशिक़ माशूक के हुक्म की पैरवी करता है। हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज  رحمة الله عليه सच्चे आशिके रसूल थे। आपकी हर वक़्त सुन्नतों पे चलते थे। एक बार आपने वुज़ू किया तो दीठि में ख़िलाल करने की सुन्नत वो भूल गए, थोड़े वक़्त के बाद आपको याद आया तो आपको इसका बहुत अफसोस हुआ। ये सुन्नत छूटने के गम में आप रोते रहे। आपके खलीफा बख्तियार काकी رحمة الله عليه ने अर्ज़ की हुज़ूर क्या बात है, आप क्यों इतना रो रहे हो ? आपने फ़रमाया वुज़ू करने मुझसे ख़िलाल की सुन्नत करना में भूल गया, जब जब मुझे वो याद आता है तो मेरी आंखोसे आंसू बहने लगते है! मुझे ये फिक्र है कि क़यामत के दिन नबीए करीम ﷺ मुझसे सवाल करेंगे कि ए मोइनुद्दीन! मेरी सुन्नत क्यों छोड़ दी ? तो में क्या जवाब दूंगा, आक़ा को ये मुंह कैसे दिखाऊंगा।

    इसे कहते है सच्ची मुहब्बत! की सिर्फ एक बार महबूब के पसन्द छूट गई वो भी गलती से, फिर भी आपको इतना ज्यादा अफसोस! और हम सुन्नतों की पैरवी तो दूर, जान बूझ कर फ़राइज़ को छोड़ रहे है! हालांकि एक बार ख्वाजा साहब ने फरमाया की क्या मुसलमान नमाज़ में ताखीर कर सकता है? मतलब ये की ख्वाजा साहब ये क़बूल करने राज़ी नही की मुसलमान नमाज़ में ताखीर करे


सहाबा ज़बान से महब्बते रसूल के नारे लगाते थे वही उनके दिल भी उस बात को क़बूल करता था। इसी वजह से उनकी महब्बत अमल के ज़रिए देख ने को मिलती थी। और हम महब्बत ज़बान तक ही रहने देते है, उसे दिल तक नही पहुंचने देते। वरना मुहब्बत के बर अक्स हमारे अमल न होते। आज हम घर मे पंखे के नीचे बैठ  कर भी नमाज़ से गाफिल है और सहाबा तो रेत के ठेर पर लड़ाई के मैदान में, तलवारों की छांव में भी नमाज़े अदा किया करते थे। और आज हम नौकरी कारोबार में 2 पैसे ज़्यादा कमाने के लिए हम फरज़ो को भुलाए बैठे है। 

    ऐसा क्यूं ? क्योंकि हमने दिलमा मुहब्बत को मजबूत नही बनाई और नफ़्स को मौत की दावत नहीं दी।

     गौषे पाक رضي الله عنه ने 40 साल ईशा के वुज़ू से फजर की नमाज़ अदा की यानी के आप 40 साल तक रात को सोये नही और अल्लाह की इबादत करते रहे। गौषे पाक رضي الله عنه के चाहने वाले क्यूं फ़ज़र के वक़्त आराम से सोये हुए मिलते है?

    ख्वाजा गरीब नवाज رضي الله عنه तो जब वज्द में आके बेहोश हो जाते तो बख्त्यार क़ाक़ी आपको सलात सलात कह कर होश में लाते। जब आप होश में आते तो फरमाते नमाज़ किसी पे भी माफ नहीं।

    सहाबा और बुजुर्गो के शरीअत पर अमल करने वाले अनगिनत वकीआत सुनने को मिलेंगे। क्योंकि वो अल्लाह और उसके रसूल से सच्ची मुहब्बत करते थे। इसी वजह से वो उनके हुक्म के मुताबिक़ अमल किया करते थे।

     और हमारी हाल क्या है, इसके बारे में हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां رحمة الله عليه फरमाते है:
     रिज़्के खुदा खाया किया फरमाने हक़ टाला किया..
     शुक्रे करम तरसे सज़ा ये भी नहीं वो भी नहीं...


यानी अल्लाह का रिज़्क़ खा के भी हम उसके हुक्म के खिलाफ अमल करते है, ना ही हम उसकी नेअमतों का शुक्र अदा करते है,और ना ही हमे नाफरमानी करने पर सजा से डर
   

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