ताज़िया किस्त 3. Muharram 2019 . Muslim New Year 1441 - hadees war Hindi 2019 Muslim Aaj Hadees in English hadhis

ताज़िया किस्त 3. Muharram 2019 . Muslim New Year 1441

क़िस्त 3.   Mahe Muharram Mubarak

1441 New yera
ताज़िया muharram. 2019

Post ko  Puri padhe aur Shabab ke hakdar bane


ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !!

ख़्वाजा ए ख़्वाज-गां सुल्तानुल हिन्द औलादे हसनैन कारीमैन सैय्यदना ग़रीब नवाज़ मोइनुद्दीन हसन चिश्ती संजरी सुम्मा अजमेरी रहमतो रिज़वान का ममनून ए करम है ये अर्ज़े विलायते हिन्द जहाँ आपकी आमद ए पाक के सदक़े ईमानो इस्लाम का उजाला दारुल कुफ़्र को विलायत ए मुर्तज़वी और दीने मुहम्मदी की किरनों से मुनव्वर कर गया..और लोग ज़ौक़ दर ज़ौक़ हल्क़ा ब-गोशे इस्लाम हुए...और तबलीग़ ए दीन का तन्हा वो काम अंजाम दिया के आज की नाम निहाद जमातें मिल कर भी उसके अशरे-अशीर तक नही पहुच सकतीं...आपके दस्ते हक़ परस्त पे 90 लाख लोग दाख़िल ए ईमान हुए...आप चूंके औलादे हुसैनो हसन(अलैहिस्सलाम) हैं..लेहाज़ा कर्बला वालों का ग़म फ़ितरतन ओ विरासतन आपको मुंतकिल हुआ...और आप अपनी हयाते ज़ाहिरा में भी ग़मे हुसैन में मुब्तिला रहा करते थे...जिसका सुबूत ये है के आज भी दरगाहे सरकारे अजमेर में आपका मख़सूस "ताज़िया-शरीफ़" जो चांदी का बना हुआ है मौजूद है...

5 मोहर्रम शरीफ़ को जब हज़रत बाबा फरीदुद्दीन गंजे शकर रहमतुल्लाह अलैह का हुजरा और चिल्ला-गाह अजमेर शरीफ़ में खुलता है तो उस में मौजूद ग़रीब नवाज़ के उस ताज़िया शरीफ़ की ज़ियारत ज़ायरीन करते हैं...लेहाज़ा हम अहले-हिन्द ओ पाक बड़े फ़ख़्र से कहते हैं के जिस दर से हमे इस्लामो इरफ़ान की तालीम मिली...जिस दर से औलिया ए ज़माना अपनी निस्बातों पे फ़ख़्र करते हैं...जिस दर के ख़ुशा-चीन बड़े बड़े अहले इल्म ओ इरफ़ान, साहिबाने हालो विजदान ख़ासाने ख़ुदा हैं...उसी दर ए पाक से हमको ताज़िया-दारी अय्याम ए ग़मे हुसैन के आमाल मिले हैं जो सरासर ग़ुलामी ए अहलेबैत ओ मोहब्बते आले पाक के जज़्बे से ममलू है !



बिलाद ए हिन्द में सिलसिला ए आलिया कादरिया के जलील उल क़द्र बुज़ुर्ग हज़रत मख़्दूमिना वा सैय्यदना ख़्वाजा सैय्यद अब्दुर्रज़्ज़ाक़ बंसवी रहमतुल्लाह अलैह का यही अमल और अक़ीदा था जो सरकारे चिश्तियां ग़रीब नवाज़ का अक़ीदा ओ मामूल था ! चुनांचे शहज़ादे ग़ौसुल वरा ख़्वाजा ए क़ादरिया हज़रत क़िब्ला शाह सैय्यद अब्दुर्रज़्ज़ाक़ बंसवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं
"ताज़िया शरीफ़ को कोई ये ना समझे के महेज़ कागज़ पन्नी का बना हुआ ढांचा बल्कि अरवाहे मुक़द्दस हज़रते शोहदा ए किराम (अलैहमुस्सलाम) की इस पे ख़ुसूसी तवज्जोह होती है "
हवाला 📚📚📚 करामात ए रज़्ज़ाक़ियाह


उलेमा ए फिरंगी महल तमाम के तमाम आप ही की बारगाह की ग़ुलामी पे नाज़ करते हैं लेहाज़ा ये अक़ीदा ताज़िया-शरीफ़ के मुताल्लिक़ उलेमा ए फिरंगी महल के शैख़ुल शुयूख़ क़ुत्बुल अक़्ताब हज़रत मीर सैय्यद अब्दुर्रज़्ज़ाक़ साहिब क़िब्ला का है...और तमाम उलेमा ए फिरंगी महल जिनकी इल्मी अज़्मतो और ख़िदमते दीनो फ़िक़ह ओ उलूमे दीन का एक ज़माना मोतारिफ़ है..उनका भी अक़ीदा अपने मलजा ओ मावा हादी ओ रहनुमा का रहा.

देहली शुरू से अहले-इस्लाम का मर्कज़ रहा जहाँ उमूरे सल्तनते इस्लामी के अलावा उलेमा ओ सूफ़िया औलिया ओ साहिबाने इल्मो दानिश का गहवारा रहा है...इस देहली की ज़र-खेज़ सरज़मीन से अकाबेरीन की ऐसी जमात वाबस्ता है के सारी दुनिया को आज जिनपे नाज़ है...हिन्दोस्तान में इल्मे हदीस के लाने वाले हज़रत शाह वाली-उल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह का घराना है...जिसके ख़ुश-चीन तमाम उलेमा रहे.

हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह अपने फ़तावा (अल-मारूफ़ फ़तावा अज़ीज़या, जिल्द 1 सफ़ह 66) पर ताज़िया-दारी के मुताल्लिक़ फ़रमाते हैं..."इस फ़क़ीर के मकान पे साल में दो मौक़ों पर इज्तेमा ए अज़ीम होता है..एक रबीउल अव्वल शरीफ़ में और दूसरा मोहर्रम शरीफ़ में यौमे आशूरा के दिन...के इस दिन रूहे मुबारक पैग़म्बरे ख़ातिम सरवरे अम्बिया (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम)की निहायत ग़मगीन होती है...और ये फ़क़ीर ख़ुद वाक़ेयात ए शहादत बयान करता है...और इत्तेफ़ाक़ से अगर मरसिया मशरूह पढ़ने का मौक़ा होता है तो अहले महफ़िल के साथ साथ इस फ़क़ीर को भी गिरया ओ बुका लाहिक़ होती है,फिर फ़ातेहा हज़रात इमामैन अलैहमुस्सलाम की होती है और सबीलो लंगर तक़्सीम होता है...लेहाज़ा अगर ये सब कुछ जिसका ज़िक्र किया गया है...फ़क़ीर के नज़दीक जायज़ ना होता तो ये फ़क़ीर हर्गिज़ इसका इक़दाम ना करता"


ये अक़ीदा ओ अमल महेज़ एक आलिम का नही बल्कि इमामुल हिन्द मारजा उल उल्मा मुहद्दिसे जलील हज़रत अल्लामा शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी (अलैहिर्रहमा) का है जिनकी ज़ाते सुतूदा सिफ़ात से बर्रे सग़ीर के इल्मी मीनारे आज भी चमक रहे हैं !
हज़रत मौलाना सलामत अली साहब मुहद्दिस (अलैहिर्रहमा) फ़रमाते हैं...आप हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ साहब के तिलमिज़े रशीद हैं...अपने फ़तावा में फ़रमाते हैं के "अल्हम्दुलिल्लाह ताज़िया-दारी आसारे इस्लाम में से है और एक आलम इसके फैज़ान से बहरावर होता है और इसके बहुत से दीनी फ़ायदे हैं"
हवाला : 📚📚 तब्सीरातुल ईमान




हज़रत क़िब्ला ए आलम शाह नियाज़ अहमद साहब बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह जो ज़बर्दस्त आलिमे दीन सूफ़ी ए साफ़ी ओ वली ए कामिल वली-गर हैं के एक ज़माना जिनकी बुज़ुर्गी ओ अज़मत का क़ाइल है...ताज़िया-दारी से जो शगफ़ आपको था ज़माना इसका शाहिद ओ गवाह है !

शबे आशूरा आप 2 बजे ताजियों की ज़ियारत को तशरीफ़ ले जाते और 5 या 7 ताजियों की ज़ियारत फ़रमा कर वापस ख़ानक़ाह शरीफ़ में रौनक़ अफ़रोज़ होते...आख़ीर उमर में जब चलने की ताब ओ ताक़त ना रही तो आप मुस्तग़रग़ बैठे थे.."के सूरते नूरानी मख़्दूमा ए कौनैन जनाब बीबी सय्यदा फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैह" की जलवा-गिरी हुई...बिन्ते मुस्तफ़ा उम्मुल हसनैन (अलैहमुस्सलाम) ने फ़रमाया...."के मियाँ आज हमारे बच्चों की ज़ियारत को ना उठोगे???"

इस इरशाद ए बिन्ते मुस्तफ़ा को सुन ना था के आपको गिरया ओ बुका तारी हुआ...खुद्दाम को हुक्म हुआ के...हमको ले चलो ...ख़ादिमों ने अर्ज़ किया के हुज़ूर चारपाई पे ले चलें...आपने फ़रते अदब से फ़रमाया नही...बल्कि पैदल ही ले चलो...लेहाज़ा दोनों जानिब ख़ुद्दाम ने पकड़ा और आप पैदल ज़ियारत ए ताज़िया-शरीफ़ को तशरीफ़ ले गए.

इसी ज़िमन में हज़रत का एक वाक़ेआ और है..जो अहले निस्बत हज़रात के लिए जान-फ़िज़ा है के ये ताज़िया-दारी अगर अदब,एहतेराम,अक़ीदत से की जाए तो यक़ीनन हसनैन ए पाक (अलैहमुस्सलाम) का करम शामिले हाल होता है...और ये हज़रात अपने चाहने वालों को मुलाहिज़ा फ़रमाते हैं !

एक बार सूरत के रहने वाले एक आलिम ए दीन जो हज़रत शाह नियाज़ अहमद अल्वी रहमतुल्लाह अलैह के मुरिद थे...आपके साथ थे...आप ताज़िया शरीफ़ की ज़ियारत को चले...जब ज़ियारत से फ़ारिग़ हुए तो आपने उस तख़्त को बोसा दिया जिसपे ताज़िया शरीफ़ रखा था...इस पर मोलवी साहब के दिल में वस्वसा हुआ के हज़रत ने ये क्या ग़ज़ब किया ????....आप उसके दिल के ख़तरे पर मुत्तला हुए और उनसे फ़रमाया...के ताज़िया शरीफ़ की जानिब देखो...जूं ही मोलवी साहब ने ताज़िया शरीफ़ की तरफ़ निगाह की चीख़ मार कर बेहोश हो गए...जब होश आया तो फ़रमाया..."मोलवी साहब ...आपने क्या देखा ??...मोलवी साहब की आँखों से आंसू जारी हो गए...उन्होंने अपना मुशाहिदा बयान करते हुए कहा कि मैंने देखा....ताज़िया शरीफ़ की एक जानिब शहज़ादा ए सब्ज़ क़बा जनाब ए इमामे हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम हैं और दूसरी जानिब शहज़ादा ए सुर्ख़ क़बा इमामे हुसैन शहीदे कर्बला अलैहिस्सलाम जलवागर है!

हवाला 📚📚 मख़्ज़ानुल ख़ाज़ैन, करामत ए निजामिया
ताज़िया किस्त 3. Muharram 2019 . Muslim New Year 1441 ताज़िया किस्त 3. Muharram 2019 . Muslim New Year 1441 Reviewed by hadees on 18:27 Rating: 5

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