2019.हुसैनी दिन यानी 10 मुहर्रम. मुहर्रम में कुछ लोग इमाम हुसैन के किरदार को भूल गये और इस दिन को खेल तमाशो, - hadees war Hindi 2019 Muslim Aaj Hadees in English hadhis

2019.हुसैनी दिन यानी 10 मुहर्रम. मुहर्रम में कुछ लोग इमाम हुसैन के किरदार को भूल गये और इस दिन को खेल तमाशो,

         2  019              ﴾ ﷽ ﴿     



          मुहर्रम कैसे मनाये 
मुहर्रम कैसे मनाये  2020
मुहर्रम कैसे मनाये 

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पोस्ट नं. ➪​:1

🌟 اَلصَّــلٰوةُوَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَارَسُوْلَ اللّٰهﷺ

    🇹🇷 हुसैनी दिन यानी 10 मुहर्रम. मुहर्रम में कुछ लोग इमाम हुसैन के किरदार को भूल गये और इस दिन को खेल तमाशो, गैर शरई रस्मो नाचगाना, मेले और गुमने फिरने का दिन बना दिया। और ऐसा लगने लगा की जेसे इस्लाम मजहब भी दूसरे मजहबो की तरह खेल तमाशो, गुमने फिरने और रंग रलिया वाला मजहब है।

    🇲🇷 मुसलमान कहलाने वालो में सिर्फ एक फिरका जिसको राफजी यानी शिया कहते है उनके वहा नमाज़, रोज़ा वगैरा शरीअत के हुक्मो का और दीनदारी के मुआमले में कोई अहमियत देने में नहीं आता। बस मुहर्रम आते ही रोना, पीटना, चिल्लाना यही उनका मज़हब है। जाने की अल्लाह ने उसके रसूल को यही सब करने और सिखाने भेजा था और यही सब बेतुकी बातो का नाम इस्लाम है।

    📖 जबकी हदीसे पाक में है : हुज़ूर ﷺ फरमाते है जो कोई गममे गाल पिटे, गला फाडे, जाहिलियत के ज़माने जैसा चिल्लाये वो हम में से नहीं है।

(मिश्कात शरीफ, स. 150)


पोस्ट जारी रहेगी इन्शा अल्लाह

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      दिनी तालीम post
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   📖 इस्लाम सब के लिए हैं
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☝हमारी दावत एक सच्चे दीन की तरफ
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✏ आओ इल्म -ए-दीन सीखें..,







नियाज़ और फातेहा

पोस्ट नं. ➪;​2

🌟 اَلصَّــلٰوةُوَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَارَسُوْلَ اللّٰهﷺ

🌸 नियाज़ और फातेहा

    🇹🇷 हज़रत इमाम हुसैन और जो लोग उनके साथ शहीद हुए है उनके इसाले सवाब के लीये सदका, खैरात करे, गरीबो मिस्नकिनो , दोस्तों, पड़ोसीओ, रिस्तेदारो को शरबत या खिचड़ा या मलीदा वगैरा कोई भी जाइज़ खाने पिने वाली चीज़े खिलाना और पिलाना जाइज़ है और उसके साथ अगर क़ुरआन की आयते तिलावत करे तो और बेहतर है।

    ☝🏻 इन सब बातो को नियाज़ फातेहा कहते है। ये सब बिना सूबा जाइज़ और मुस्त हसन है और बुजुर्गो की अकीदत पेश करने का अच्छा तरिका है।

    🌹 लेकिन इन सब बातो में कुछ चीज़ों का ध्यान रखना ज़रूरी है।

🌟 اَلصَّــلٰوةُوَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَارَسُوْلَ اللّٰهﷺ


🌹 नियाज़ फातिहा कोई भी हलाल और जाइज़ खाने पिने की चीज़ों पे हो शकता है, इसके लिए शरबत, खिचड़ा, मलीदा यही होना ज़रूरी है ये समजना जहालत है।

    🌸 नियाज़ और फातेहा करने में बड़ाई नहीं करनी चाहिए, और खाने पिने की चीज़ों में एक दूसरो से मुकाबला नहीं करना चाहिए। बल्कि जो कुछ भी और जितना हो सब सिर्फ अल्लाह वालों के ज़रिये अल्लाह की नज़दीकी और रिजा हासिल करने के लिए और अल्लाह के नेक बन्दों की मुहब्बत इसलिए करते है के उनसे मोहब्बत करना और उनके नाम पर खिलाना और उनकी रूहो को अछे कामो का सवाब पोहचाने से अल्लाह खुश् होता है, और अल्लाह को खुश करना ही हमारी ज़िन्दगी का मकसद है।




पोस्ट नं. ➪​:4


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💎 ताजिया के बारे में गलत फहमी पार्ट: 01

    🇲🇷 आज कल जो ताजिया बनाते है उसमे पहली बात ये की वो हज़रत इमाम हुसैन के रोज़ा मुबारक की तरह नहीं होता। अजब कज़ब तरीके के ताजिये बनाये जाते है। और फिर उसे गुमाते हे गस्त लगाते है। एक दुसरो से मुकाबला करते है और ऐसे मुकाबले में कभी कभी जगडे फसाद भी हो जाते है। और ये सब इमाम हुसैन की मुहब्बत के नाम पर होता है।

    🌴 अफ़सोस! ये मुसलमानो को क्या हो गया है? वो कहा से चला था और कहा पहोच गया? कोई समजाये तो मानने के लिए राज़ी नहीं, बल्के समजाने वाले को ही भला बुरा कहते है।

    🛡 मतलब के अभी के वक़्त में जो ताजिया और उसके साथ होने वाली सब बिदअते और बुराइया और वाहियात बाते सब नाजाइज़ और गुनाह है।

   🔮 जेसे के मातम करना, ताजिया पे चढ़ावा चढ़ाना, उसके सामने खाना रख के वहा फातिहा चढ़ाना, उनसे मन्नते मुरादे मांगना, उनके निचे से बच्चों को निकालना, ताजिया देखने जाना, उसको जुक जुक कर सलाम करना, सवारिया निकलना ये सब जाहिलाना और नाजाइज़ बाते है। इसे इस्लाम के साथ कोई वास्ता नहीं। और जो लोग इस्लाम को अच्छे से जानते है उनका दिल खुद ही कहेगा के इस्लाम जिस सीधा और शराफत वाला मज़हब ये तमाशा और वहेम परस्ती भरी बातों को कैसे कबुल कर शकता है।





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💎 ताजिया के बारे में गलत फहमी पार्ट: 02

   ☝🏻 कुछ लोग कहते है ताजियादारी और ढोल तमासे और मातम करते हुए गुमने से इस्लाम और मुसलमान की शान जाहिर होती है। लेकिन ये फ़ुज़ूल बात है। 

    💗 पाँच वक़्त की अज़ान और महोल्ला, बस्ती और सभी मुसलमानो का मस्जिद में नमाज़े बा-जमाअत से ज्यादा मुसलमानो की शान बढ़ा ने वाली कोई चीज नहीं।

     💖 ताजियादारी व उसके साथ ढोल तमासे और नाचना, कूदना और मातम मनाना और बुज़ुर्गोके नाम पर गैर शरई उर्स, मेला और आजकी कव्वालियों की महफिले देख के गैर मुस्लिम ऐसा समजते है के ये भी हमारे मज़हब के जैसा तमाशेवाला मज़हब है। 

    👉 और नमाज़, रोज़ा, ईमानदारी और सच्चाई, शरीअतके हुक्मो की पाबन्दी और दीनदारी देख के गैर मुस्लिम ऐसा कहते है की "अगर मज़हब कोई है तो वो इस्लाम ही है"

    ☝🏻 कोई मज़बूरी की वजह से वो मुसलमान नहीं बनते पर उनका दिल मुसलमान बनने को तड़पता है।  और कितने तो मुसलमान हो भी जाते है, और होते रहते है। 

    🗓 ज़रा सोचे 1400 साल में मुसलमान की तादाद कितनी हो चुकी है। 

    ❤ ये सब नमाज़, रोज़े, इस्लाम की सीधी सच्ची बाते देख के बने है, ना की ताजियादारी, मेले तमासे देख के बनते है। 

    👉 और ताजियादारी इस्लाम की शान नहीं बल्कि बदनामी है। आज वहाबी के उलमा यही सब दिखाके सुन्नियो को वहाबी बनाते है। यानी वो हमारे ये गैर मज़हबी रश्मो रिवाज़ दिखा के वहाबी बनाते है।  

    🌹 मुसलमान का अक़ीदा और ईमान इतना मजबूत होना चाहिए की दुनियाइ नफ़ा हो या नुकशान पर हम तो वही करेंगे जिससे अल्लाह और रसूल राज़ी होते है। 

📕 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजायज़)













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📖 ताज्यादारी और क़ुरआन व हदिष

     और उनलोगो से दूर रहो जिन्होंने अपने दिन को खेल तमाशा बना दिया है और उनको दुनिया की ज़िन्दगी ने धोका दे दिया है। 
📕 (पारा~7, रुकूअ~14)

    🌴 जिन लोगो ने अपने दिन को खेल तमाशा बना लिया और दुनिया की ज़िन्दगी ने उनको धोकेइ डाल दिया, आज हम उनको छोड़ देंगे जेसे उन्होंने ये दिन (क़यामत) का ख्याल छोड़ रखा है और जो हमारी आयतो से इन्कार करते थे।

📕 (पारा~8, रुकूअ~13)

    📖 इन आयतो को देखे तो आज के ताज्यादारी और उर्स के नाम पे जो नाच, तमाशा और कव्वालियां हो रही है वो सब याद आयेगा और इंसाफ की नज़र कहेगी की ये वही लोग है जो इस्लाम को तमाशा बना रख्खा है और मजहब को हँसी खेल का रूप दे दिया है।

    📖 क़ुरआने करीम में अल्लाह ताला जगह जगह पर दर्द और मुसीबत के वक़्त सब्र करने का हुक्म दिया है। ना की रोना, पीटना, चिल्लाना और मातम मनाना। 

     हदिष शरीफ में है रसूल صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया ; जो मैयत के गम मे गाल पिटे, गरेवान् फाडे और ज़माने जाहिलियत की तरह चिल्लाये तो वो हम मेसे नहीं। 
(सहीह बुखारी 1/173)

    एक और हदिष में आप फरमाते है : अल्लाह ताला ने मुझे ढोल, बाजे और बंसरिओ को मिटाने का हुक्म दिया। 
 (मिश्कात, 318)
 (किताबुल अमारत, 3)

    और एक हदिष में आप फरमाते है : मेरी उम्मत में ऐसे लोग होंगे जो ढोल बाजो को हलाल कर लेंगे। 
📕 (सहीह बुखारी, 2/387)
📕 (किताबुल अशरीबा)

अल्लाह तआला हमें इन सब बातो से बचाये।
आमीन....





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🌴 ताज्यादारी और उलमा ए एहले सुन्नत

    कुछ लोग समजते है की ताज्यादारी सुन्नियो का काम है और उससे रोकना, मना करना वहाबियों का काम है। जब की जबसे ये ताज्यादारी सुरु हुई है तबसे कोई भी जिम्मेदार सुन्नी उल्माने उसे अच्छा नहीं कहा। 

    🇮🇳 हिन्दुस्तान में वहाबियत से पहले के उलमा व बुज़ुर्ग हज़रत शाह अब्दुलअजीज मुहदिशे दहेल्वी फरमाते है : मुहर्रम के 10 दिनो में जो ताज्यादारी होती है वो सब नाजाइज़ है। 
📕 (फतावा अजीजिया, 1/75)

     आला हज़रत जो इमामे एहले सुन्नत कहलाते है जिनका फतवा सारे जहा में माननीय है वो फरमाते है : आज कल ताज्यादारी वो नापसंदीदा तरीके का नाम है, जो बिदअत, नाजाइज़ और हराम है। 
📕 (फतावा राज़वीययह, 24/513)

    🌹 जो कहते है ताज्या बनाना एहले सुन्नत का काम है वो आला हज़रत की किताबोका मुताअला करे, एक पूरी किताब आप ने इस बारे में लिखी है जिसका नाम है
"आलिल इफ़ादा फि ताजियतील हिंद व बयाने शहादत"

    🇮🇳 मुफ़्ती आजमे हिंद मौलाना शाह मुस्तफा रज़ाखा फरमाते है : ताज्यादारी शरीअत की बिना पर नाजायज़ है। 
📕 (फतावा मुस्तफविय्यह, 534)

    ❤ सदरूश्शरीअह हज़रत मौलाना अमजदअलि साहब फरमाते है : ये बिलकुल खुराफात है। इन सब से हज़रत सैयदना हुसैन की रूह खुश नहीं। ये घटना तुम्हारे लिए नसीहत था और तुमने उसे खेल तमाशा बना लिया। 

📕 (बहारे शरीअत, 16/248)
📕 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजायज़)








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    🇹🇷 मुहर्रम में हरा या कला कपडा गम या शोक मनाने के लिए पहनते है। ऐसा शोक इस्लाम में हराम है। 

     उसके अलावा भी कई और बातो को रिवाज बना दिया है, जेसे की मुहर्रम के शुरू के 10 दिन कपडे न बदलना, दिन को रोटी न पकानी, मटन न खाना, पलंग पे न सोना, इस माह में शादी को बुरा जानना वगैरा, ये सब बे बुनियादी और जहालत की बाते है। 

    🌹 आला हज़रत फरमाते है : मुहर्रम के 10 दिनों में ताज्या की सवारी निकली जाती है और उसके साथ तमाशे व ड्रामा होते है ये सब नाजाइज़ और गुनाह है। 

     अल्लाह तआला हमें इस्लाम को सही मानो मे समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता करे। आमीन....

    🌸 भाइयो ! ये दिल है इसे हम जिसमे लगाएंगे उसमे लग जायेगा। गाना बजाना, मेलो तमाशो में लगाएंगे तो उसमे लगेगा और अगर इस दिल को नमाज़, रोज़ा व क़ुरआन की तिलावत में लगाएंगे तो उसमे लगजयेगा। 

     अफ़सोस ! हमने अपने दिल को गानो, मेलो तमाशो में लगा दिया है, और मौत नजदीक आ रही है, मरने से पहले अपने दिलोको नमाज़, रोज़े, क़ुरआन की तिलावत व दिनी किताबो और अछि बातो में लगाने की कोशिस करे।
अल्लाह हमें कामयाबी अता करे।
 आमीन....
📕 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजायज़)
         पोस्ट मुक्कमल



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 Ameen
Please


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