ताज़िया शरीफ़ tajiya Sharif banana chahie ya nahin - hadees war Hindi 2019 Muslim Aaj Hadees in English hadhis

ताज़िया शरीफ़ tajiya Sharif banana chahie ya nahin

क़िस्त 2
Mahe mohharam tajiya 2019

ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !! 

तुम्हारे घर का कोई मर जाये तो नहला धुला कर कफ़न पहना कर मैदान में रख आए और सब के सब हाथ बांध कर खड़े हो गए...तो अगर कोई ये समझे के मुसलमान मरते ही ख़ुदा हो जाता है और सारी क़ौम उसकी पूजा पाठ में लग जाती है (माज़अल्लाह)...तो ऐसे ख्यालों की वजह से तुम नमाज़े जनाज़ा छोड़ दोगे ????..लोग पता नही क्या सोचेंगे ?? ये अंग्रेजों यहूदियों का फार्मूला तुम्हे तबाहो बर्बाद कर देगा दीनो दुनिया कहीं का नही रखेगा!!!

एक ऐतराज़ ये भी होता है के उश्शाक़ ए हुसैनी ने फ़र्ज़ी कर्बलाएं बना रखी हैं जहाँ ताजियों को दफ़न कर देते हैं या पानी में ग़र्क़ कर देते हैं...ये सब ख़ुराफ़ात है..दीन से इसका कोई ताल्लुक़ नही...!...इसका फ़ौरी जवाब ये है कि हाँ यज़ीदी दीन से इसका कोई ताल्लुक़ नही है...मगर दीन ए मोहम्मदी से इसका गहरा ताल्लुक़ है...

जब क़ुरआन ए पाक बोसीदा हो जाता है तो क्या करते हो ?... दीनी किताबें ख़स्ता हाल हो जाएं तो क्या करते हो??..चूल्हे में जला देते हो क्या...यज़ीदी ज़रूर जलाते होंगे क्योकि यज़ीद ने गिलाफ़ ए काबा शरीफ़ जलाया था!...मगर हम हुसैनीं हैं हम क़ुरआन को "शएरिल्लाह" मानते हैं इसकी ताज़ीम करते हैं...हमारे पेशवा ने हमें तालीम दी है जब क़ुरआन ए पाक बोसीदा हो जाए तो उसको दफ़न कर दो या पानी में ठंडा कर दो के औराक़ ए क़ुरआन की बे-हुरमती ना होने पाए इसलिए के इन कागज़ी सफ़हात को अल्लाह के पाकीज़ा कलाम से निस्बत है ! लेहाज़ा इसे दफ़नाया जाए या पानी में ठंडा कर दिया जाए... ये इस्लाम ने हमे तालीम दी है ! 

तो बाद अज़ अय्याम ताज़िया शरीफ़ का क्या किया जाये???....इसके दो तरीख़े हैं या तो इसे महफूज़ मकान..मिस्ल इमामबाड़ा..या मस्जिद या ख़ानक़ाह या मदरसे...जहाँ इसकी ताज़ीम मल्हूज़ रखी जा सके...वहां इसे मुन्तक़िल कर दिया जाये...या फिर इसे दफ़ना दिया जाए या पानी में ठंडा कर दिया जाए ताकि इसकी बे-हुर्मती ना होने पाए !

मकान में रखने का इस्तेदलाल ये है के...जब मस्जिदों और मदरसों में मीलाद उन नबी के बैनर्स और बोर्ड हिफ़ाज़त के लिए इन तक़रीब के बाद रख दिए जाते हैं ताकि अगले साल काम आएं...तो जो नबी के शहज़ादों का सामान ए तशहीर (ताज़िया शरीफ़) है वो क्यों नही रखा जा सकता ???

लम्हे फ़िक्र है मुसलमानों...दीनी जलसे और मीलाद शरीफ़ की महफ़िलें किस शहर में नही होती...जिनमे चांदनियाँ चादरें तख़्त वग़ैरा या तो घर के होते हैं या बाजार से किराय पे मंगवाए जाते हैं...और ये किराय के सामान इस दीनी महफ़िल और जलसों से क़ब्ल भी दूसरी जगहों पे इस्तेमाल किया जाता है...मिस्ल शादियों में थियेटर में डांस पार्टी में सर्कस में और ये लाइट ये झालरें ये सजावट के सामान इससे पहले कहाँ कहाँ इस्तेमाल किये जाते हैं...बताने की ज़रूरत नही..और इस दीनी महफ़िल के बाद भी इन चीजों को कहाँ कहाँ लगना है..ये भी सब पे रोशन है..मगर वक़्ती तौर पे इन सारी चीज़ों को ...महफ़िल ए रसूल, बज़्मे रसूल और मिम्बरे रसूल जैसे मुअज़्ज़ज़ अलक़ाब दिए जाते हैं...और इसकी ताज़ीम की जाती है... ख़तीब यही कहता है ये बज़्मे रसूल है, तक़रीर करते हुए उल्मा यही कहते हैं ये मिम्बर ए रसूल है...और किसी को ऐतराज़ नही होता..कोई ग़ैर इस्लामी लिबास पहन कर इस पर बैठ जाए तो मोलवी साहब जलालो ग़ज़ब के आलम में आ कर उसको उतार देते हैं के ये मिम्बरे रसूल है, ये बज़्मे रसूल है..इसके आदाब के ख़िलाफ़ है...चन्द घन्टो के लियें सामानों का इस्तेमाल महफ़िले रसूल में हुआ तो अब इसके आदाब बदल गए,,,तौर बदल गए,,..हो सकता है के ये सारे का सारा सामान यहाँ से उखड़ने या यहाँ से जाने के बाद किसी भजन कीर्तन के प्रोग्राम में जाए, किसी नाच गाने के प्रोग्राम में काम आये..! लेकिन बज़्मे ज़िक्रे रसूल (अलैहिस्सलातो वस्सलाम) से निस्बत हो गयी तो अब इस महफ़िल में कोई बेअदबी नही कर सकता..ये वक़्ती निस्बत की जलवा-गिरी है..के घर और मैदान और उस में लगी चीज़ों की ताज़ीम की जा रही है..और सब अदब बजा ला रहे हैं...!

मैं सवाल करता हूँ..वक़्ती निस्बत का तुम्हे इतना पास और लेहाज़ है..तो ताज़िया शरीफ़ तो बना ही उनके नाम पर है..इस में किराय की कोई चीज़ इस्तेमाल नही हुई..ना ही पहले ये किसी ऐसी वैसी जगह पर इसके अज्ज़ा इस्तेमाल हुए ना ही बाद में होने का इमकान है ! तो इस हुसैनीं ताज़िया की ताज़ीम बा-दर्जा औला वाजिब हुई ! और इसकी ताज़ीम बिला शुबहा रूहे ईमान है..और वही इसकी तकरीम बजा लायेगा जिसका दिल खशियते इलाही से पुर होगा !

अहले ईमान के दो तबक़े हैं अवाम और ख़्वास... दोनों तबक़ो में ज़माने क़दीम से ताज़िया-दारी राइज है और दोनों तबक़े इसका एहतेमामो इंतेज़ाम और इकरामो एहतेराम करते चले आ रहे हैं.

ताज़िया शरीफ़ का वजूद कोई नया नही..ये इतना ही पुराना है जितना मीलाद उन नबी की महफ़िलो मजलिस का वजूद है जो क़ायम ओ तआम के साथ अरबो अजम में जारी था और अब भी है.

ख़ुसूसन बर्रे सग़ीर पाक ओ हिन्द में आमद ए इस्लाम के साथ साथ ताज़िया-दारी राइज हो गयी थी.


..........पोस्ट अभी बाक़ी है दोस्त

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