ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !! - hadees war Hindi 2019 Muslim Aaj Hadees in English hadhis

ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !!



क़िस्त 1      Mahe Muharram

 ताज़िया शरीफ़.  Tajiye

                        क़िस्त 1


✔ ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !! 


✔ ***** बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम *****

अल्लाहुम्मा सल्ले अला सय्यदीना मुहम्मदिन जद्दिल हसने वल हुसैन व आलेही व सल्लम

✔ सवाल : 👇
1- ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत क्या है ?

✔ अल-जवाब : 👇



इस बाबत सबसे पहले हम अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की नाज़िल करदा आख़री किताब "क़ुरआन ए मजीद" की
बारगाह में साईल होते हैं जो रहती दुनिया तक के लिए हिदायत का सर-चश्मा है, हमने क़ुरआन ए करीम से अर्ज़ किया के ऐ रब्बे अलीमो ख़बीर के पाकीज़ा कलाम इस बाबत हमारी रहनुमाई फ़रमा के जो चीजें अल्लाह वालों से मनसूब हो जाती हैं उनका मक़ाम दीन ए हक़ में क्या है ?

क़ुरआन ने इरशाद फ़रमाया : " इन्नस सफ़ा वल मरवता मिन शाइरिल्लाह " (अल-बक़राह)
"बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं"

✔ इस आयत में अल्लाह ने सफ़ा और मरवा दो पहाड़ियों को जो शहरे मक्का में हैं उन्हें अपनी निशानियां क़रार दिया ! फ़क़्त इसलिए के इन दोनों पहाड़ियों को अल्लाह की एक महबूब बन्दी और वलियाह हज़रत ए बीबी हाजिराह (रदिअल्लाहो अन्हा ) के क़दमों से निस्बत हो गयी. सालेहीन से जो चीज़ मनसूब हो जाएं वो अज़मत वाली हो जाती हैं,और ख़ुदा उसे अपनी निशानी क़रार देता है
दीन का ये उसूल है हर अज़्मतो निस्बत वाली शै का एहतेराम बजा लाना ऐन मरगूब ओ मंदूब अमल क़रार पाया है !

जबहि इस अमल ए ताज़ीम की तारीफ़ और तौसीफ़ में क़ुरआन ने गवाही दी..."वा मन युअज़्ज़िम शाएरिल्लाह फ़ा इन्नहा मिन तक़्वल क़ुलूब"
यानि..जो अल्लाह की निशानियों की ताज़ीम करते हैं तो बेशक इसमें दिलों का तक़वा है...." यानि जो ताज़ीम बजा लाते हैं उनके दिलों में अल्लाह ने तक़वा नख़्श फ़रमा दिया है के वो उसकी ख़शिय्यत से मुतास्सिर हो कर उस शै की ताज़ीम ओ तकरीम करते हैं यही लोग अहले-तक़वा हैं !

✔ अदब वही करता है जिसके दिल में ख़ौफ़े ख़ुदा होता है
अदब ऐन ईमान है, शिर्क नही!
इबादत ए ज़ाहिरी जिस्म का तक़वा है जैसे नमाज़ रोज़ा हज वग़ैरा और अल्लाह और अल्लाह वालों से मनसूब निस्बातों की ताज़ीम दिल का तक़वा है !

✔ जिस पत्थर या जानवर को अल्लाह वालों से निस्बत हो जाये उसे क़ुरआन ए पाक "शाएरिल्लाह" कहता है
जैसे सफ़ा ओ मरवा, मक़ाम ए इब्राहीम है
हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की ऊँटनी को क़ुरआन "नाक़ातुल्लाह" (अल्लाह की ऊँटनी) कहता है !
इसी तरह हज़रात ए अम्बिया ओ आइम्मा ओ औलिया के मज़ारात ए मुक़द्दस भी "शाएरिल्लाह" हैं इसी तरह वो इन्सान जिनको अज़मत वालों से निस्बत हो जाए वो भी इसी ज़िमन में आते हैं

✔ जैसे "बनी फ़ातिमा (सय्यदा फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा की औलाद ए पाक) को निस्बत अल्लाह के हबीब ए मुकर्रम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) से है के उनके ख़ून ओ ख़मीर अस्ले नुबूवत के शर्फ़ से मुतास्सिल है लेहाज़ा सादात ए किराम भी "शाएरिल्लाह" हुए !

✔ अब देखें "हजरे अस्वद" को जो ख़ाना ए काबा में नसब एक स्याह (काला) पत्थर है उसे तमाम ज़ायरीन ए हरम ओ हुज्जाज़ चूमते हैं क्यों ? क्योकि उस काले पत्थर को रसूले पाक के लबे पाक से निस्बत है..तो सारी उम्मत ए मुस्लिमा का क़यामत तक ये पत्थर बोसा गाह बन गया!
इसी ज़िमन में ये भी याद रखे के हज के दौरान जहाँ लाखों इन्सानों का सैलाब हाज़िरी ए हरम ओ तवाफ़ ए काबा करता है तो हर कोई यकबारगी इस हजरे अस्वद का बोसा नही ले सकते तो लकड़ी से या किसी और शै से हजरे अस्वद को छुलाया जाता है और फिर उस लकड़ी को चूम लिया जाता है जिसे शरीयत की ज़बान में "इस्तेलाम" कहते है !
और अगर हुजूम के बाइस लकड़ी ओ असा वहां तक ना पहुचे तो हजरे अस्वद की तरफ़ अपना चेहरा करके हाथ उसकी तरफ़ फैलाया और अपना हाथ चुम लिया ये फ़रीज़ा अदा हो गया

✔ ग़ौर तलब बात ये है के निस्बत के लिए ये ज़रूरी नही के जिससे निस्बत दी जा रही है वो शै बराहे-रास्त उससे टच करती हो या जुड़ी हुई हो...पता चला निस्बत तो निस्बत होती है बराहे-रास्त हो या दूर से हो...!

✔ ताज़िया शरीफ़ को भी इमाम ए आली मक़ाम जिगर गोशा ए रसूल सय्यदुश्शोहदा हज़रत हुसैन इब्ने अली ओ फ़ातिमा बिन्त ए मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से निस्बत है

✔ ये भी ज़रूरी नही के ताज़िया शरीफ़ ऐन रौज़ा ए इमाम की शक्ल में हो..बल्कि लोग अपने अपने अंदाज़ और ज़ौक़ और शऊर के मुताबिक़ ताज़िया बनाते हैं...
अस्लन ताज़िया शरीफ़ का मक़स्द तशहीर ए पैग़ाम ओ वाक़्यात ए कर्बला है...के साडी दुनिया में इस अज़ीम वाक़ये का चर्चा हो और अहले-ईमान के अंदर जज़्बा ए ईसार ओ क़ुरबानी और हिमायत ए दीन पैदा हो !

✔ लेकिन ये अमल यज़ीदियों को एक आँख नही भाता.....!!

✔ तशहीर का काम कहाँ नही ?? जिस समाज में तुम रहते हो वहां सुब्हो शाम रातो दिन ये काम जारी है...किसी की शादी हो..सारा घर सजा है गेट बने हैं झालर लगी है गलियां सजी हैं..क्यों ??? ताकि मालूम हो..के शादी का घर है ! 
जलसा हो इज्तेमा हो..पोस्टर चिपके हैं बैनर लगे हैं ...जलसा गाह झंडियां और क़ुम-क़ुमों से सजी है..क्यों ?? ताकि सबको पता चले के यहाँ दीनी प्रोग्राम हो रहा है..तो अब चाहे दुनिया दार हो या मोलवी हो..सब इस तशहीर से अपने अपने मक़ासिद हासिल करते हैं..
अब इसी तशहीर को जब '"हुसैनीं दीवाने"' अहलेबैत के खुद्दाम ग़ुलामे सरकारने ए पंजतन..पैग़मे हुसैनी के फ़रोग़ के लिए ब-शक्ले " ताज़िया " मुश-तहर करते हैं..तो दुनिया का चेहरा क्यों बदल जाता है मोलवियों के पेट में मरोड़ शुरू हो जाती है..दुनिया भर में जलसे ओ जुलुस और दीगर महफ़िल पर क्या कुछ नही किया जाता..सब पे अयां ओ रोशन है..जिन महफ़िलों की ज़ीनत मोलवी साहेबान बनते हैं...वहां ना फ़िज़ूल ख़र्ची का कोई रोना रोता है..ना कोई हवालों का राग अलापता है..ना कोई ये पूछता है के इसकी इब्तेदा किसने की ?? कौनसी आयते क़ुरआनी से साबित है...सियाह सित्ता की किस किताब में है ?? हदीस नम्बर क्या है? ज़ईफ़ है के क़वी है?

✔ अफ़सोस इन इस्लाम के ठेकेदार मोलवियों से पूछो के अपनी तशहीर का तुम सामान करो तो सब जायज़ और वही तशहीर हम अगर नबी ए पाक के मज़लूम शहज़ादे दीं पनाह इमाम ए हुसैन अलैहिस्सलाम के लिए करें तो ना-जायज़ ?? खुराफ़ात ?? फ़िज़ूल ख़र्ची ??..

✔ ये भी ऐतराज़ किया गया अक्सर..ताज़िया शरीफ़ के आगे हाथ ना बांधो....फ़ातेहा ओ नियाज़ उसके सामने रख के मत करो..के लोग क्या समझेंगे के मुसलमान क्या कर रहा है???

✔ ताज़िया शरीफ़ के सामने अगर शिरीनी रख कर फ़ातेहा नियाज़ ओ नज़र करना ना-जायज़ है तो फिर मज़ारात ए औलिया के सामने भी शिरीनी रख कर नज़रो नियाज़ करना भी ना-जायज़ ही होगा ..इसे रोको वर्ना लोग क्या कहेंगे...के साहिबे मज़ार की फ़ातिहा हो रही है या सीधे क़ब्र की पूजा हो रही है! और यही सोच क़वी हो जाये तो फिर कहोगे रौज़ा ए अक़दस सरकारे दो आलम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) पर भी हाज़िर हो कर हाथ बांध कर सलातो सलाम अर्ज़ ना करो के लोग समझेंगे...की पूजा हो रही है माज़अल्लाह ऐसी अंधी सोच और अक़ीदे पर लानत बेशुमार लानत


क़िस्त 2  Aane Wala Hai please post ko share kar

ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !! ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !! Reviewed by hadees on 22:07 Rating: 5

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